बेटी - Hindi Poem

श्रीतमा बासु
(बीoए फाइनल ईयर छात्रा।
दसवीं एवं बारहवीं बोर्ड की परीक्षा में हिंदी में उच्चतम अंक प्राप्त। 
विद्यालय की मैगज़ीन की प्राय: दस साल की लेखिका।
हिंदी कविता लेखन एवं रचनात्मक लेखन में विशिष्ट स्थान प्राप्त।)
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बेटी हूँ मैं तेरे आँगन की आज
कल है मेरी बिदाई,
हूँ पलभर की मेहमान इस आँगन की
हो जाऊँगी कल पराई।

याद करूँगी तुम्हें क्षण-क्षण
पर तन-मन में यह कैसी कश्मकश है?
लगता है दृगों के समक्ष कोई अन्याय होने वाला है।

है वह मुझ ही से जुड़ा,
यह मैं जानती हूँ
पर जो  है उसका कारण ,
वह कतई  नहीं  मान पाती हूँ।

अम्माँ को कल ही कहते सुना,
"वे गाड़ी लेंगे ? स्कूटर लेंगे ? या सोने की चेन ?
केवल सुपुत्री से तो काम न होगा, मानकर ईश्वर की देन।"
क्यों काम न चलेगा मुझसे? क्या उन्हें केवल पैसों से मतलब है ?
फिर क्या उनके पास केवल जमीन,जायदाद,जेवर की ही कीमत है?

रिश्ते-नाते, ब्याह-विवाह यह सब तो निशुल्क है,
फिर यह कैसी नई प्रथा,आई इस मुल्क में है?
दहेज़! दहेज़! दहेज़! पगली; दहेज़ इसे कहते हैं,
यह न किया तो तेरा ब्याह न होगा,ऐसा समझवाले बोलते हैं।

नहीं करनी मुझे ऐसी विवाह अम्माँ, नहीं बनना मुझे वधु,
चली जाऊँगी पहाड़ों पर, बन जाऊँगी साधु।
घूमूंगी मैं झूमूंगी अकेली मस्त चारों पहर,
लहराऊँगी अपनी चोटी जैसे व्याकुल समुद्र की लहर।

अकेली चलूँगी, अकेली बढ़ूंगी, अकेली लड़ूंगी भी
कह दे अम्माँ तेरे समझवालों को,मेरे लक्ष्य से मैं न हटूँगी।
बदने दे मेरे भाग्य में विधाता को जो भी है बदना,
अपना भाग्य आज मुझे स्वयं ही है लिखना।

नहीं छोड़ूंगी मैं इस आँगन को,
नहीं होने दूँगी अपनी बिदाई,
नहीं बनना मुझे पलभर का मेहमान अम्माँ
नहीं होनी मुझे पराई।
मुझपर विश्वास रखो, घबराना नहीं मैया,
तेरी इस दृढ़निश्चयी बेटी को,नहीं बेच पायेगा रुपैया।

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