गर्भपात का दर्द

गर्भपात का दर्द
गर्भपात का दर्द
बच्चे को जन्म देना माँ के लिए एक अनिवर्चनीय सुख का अहसास है. प्रसव की पीड़ा और रचना का सुख दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण, प्रकृति का नारी को दिया तोहफा है जिस पर उसे गर्व होता है लेकिन यही मातृत्व जब पूर्णता को प्राप्त न हो तो अधूरा रह जाता है. सारे स्वप्न छिन्न भिन्न हो जाते हैं. एक गहरे अवसाद में दुब जाती है ऐसे में नारी.
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बांझा होने का दुख इस दुख से भिन्न है. इसमें तीव्रता है. एक बेचारगी, बेबसी, और पश्च्ताप की मिली जुली भावनाएँ होती हैं यहाँ. यूँ तो स्वेच्छा से एबॉर्शन कराने वाली नारियों की कमी नहीं. कुछ कुंआरी माँ बनने के अभिशाप से बचने के लिए, कुछ बलात्कार पीड़ित, कुछ मेडिकल कारणों से, कुछ मादा भ्रूण न चाहने के कारण गर्भपात करवाती रहती  जहाँ स्वेच्छा से एबॉर्शन कराया जाता है, माँ के लिए अजन्में की मौत इतनी त्रासद नहीं होती क्यों की यहाँ न सपने बुने जाते हैं न कोई भावनात्मक लगाव होता है. 

नारी सदमे की स्थिति तब झेलती है जब अनचाहे किसी कारणवासी, चोट बीमारी या सदमे के कारण एबॉर्शन हो जाता है. प्रकृति का अनूठा कारनामा है रिप्रोडक्शन. मानव शरीर से दूसरे मानव का जन्म. सब कुछ बहुत व्यवस्थात्मक ढंग से चलता है. नारी में होने वाली हारमोनल बदलाव उसमें ममत्व जगाते हैं. माँ होने वाले बच्चे के लिए मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से तैयार होने लगती है. माँ और बच्चे की धड़कने एक ही सुर ताल में चलने लगती हैं. अब वह अकेली होने पर भी अपने को अकेला महसूस नहीं करती. वह बच्चे से गहराई से जुड़ने लगती है.

गर्भपात हो जाने पर उसे गहरा सदमा लगता है और यह नारी पर निर्भर करता है की वह इस हादसे को कैसे लेती है. ज्यादा भावुक नारियाँ तो बिलकुल टूट जाने की स्थिति तक पहुँच जाती हैं. अजन्मे की मौत उन्हें किसी प्रियजन की मौत से कम नहीं लगती. मनोवैज्ञानिक कारणों के अलावा मेडिकल रीजन्स भी होते हैं जैसे नौ माह तक गर्भवती स्त्री में जो हारमोनल बदलाव आते हैं, वे बीच में ही गर्भपात होने की स्थिति में डिस्टर्ब हो जाते हैं इसमें उनमें गहरी निराशा और उदासीनता उत्पन्न होती है.

वह अपने को बगैर अपराध किए ही अपराधी मान गिल्ट कॉम्प्लेक्स पालने लगती हैं. उसे लगता है उसने पति समेत सारे परिवार की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. उन्हें लेटडाउन करने का बोझ उसकी आत्मा पर भारी हो जाता है. यह असफलता उसका आत्म विस्वास खत्म कर देती है. कोई शंकाएँ मन में उठने लगती हैं. कहीं में पति के प्यार न खो बैठूँ, यह डर भी सताता है. कभी-कभी सेक्स से अरुचि उसके खुशहाल दाम्पत्य पर काली छाया बन मंडराने लगती है.

गर्भधारण को लेकर मन में डर बैठ जाना आगे गर्भ धारण में रूकावट बन सकता है. यहाँ घर परिबार और पति का साथ अपनत्व, सहानुभूति, बहुत मायने रखती है. उनका मॉरल सपोर्ट मिलने पर स्त्री इस त्रासद स्थिति से जल्दी उबर कर फिर से सामन्य जीवन जीने लायक बन जाती है.

होना यह चाहिए कि गर्भपात के दुखद हादसे से गुजरी स्त्री को अतिरिक्त प्यार, स्नेह व सुरक्षा का अहसास दिलाया जाए. सम्भब हो तो इसे अकेला बिल्कुल न रहने दें. उसे यह समझाया जाए यही जीवन का अंत नहीं है. अगर बातों का अनुकूल असर पड़ता न दिखे और एबॉर्शन के एक डेढ़ महीने बाद भी स्त्री डिप्रेशन से उबर न पायें तो उसे मनोचिकित्सक के पास ले जाएँ.

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